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दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त चेतावनी- सोशल मीडिया पर न्यायपालिका का नाम खराब करने की कोशिश न करें

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Jun 10, 2026 11:48 pm IST,  Updated : Jun 10, 2026 11:52 pm IST

कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ बिना किसी आधार के आरोप लगाना या उनके इरादों पर सवाल उठाना वैध आलोचना की श्रेणी में नहीं आता।

दिल्ली हाई कोर्ट- India TV Hindi
दिल्ली हाई कोर्ट Image Source : FILE (PTI)

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका को बदनाम करने और उसकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में ऑनलाइन मंच "मूक दर्शक" बनकर नहीं रह सकते।

क्या है पूरा मामला?

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों और न्यायिक संस्थाओं की तर्कसंगत आलोचना कानूनन स्वीकार्य है, लेकिन न्यायाधीशों के खिलाफ बिना किसी आधार के आरोप लगाना या उनके इरादों पर सवाल उठाना वैध आलोचना की श्रेणी में नहीं आता। दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (डीएचसीबीए) की एक याचिका पर 08 जून को दिए गए आदेश में अदालत ने ये बातें कहीं। 

इस याचिका में सोशल मीडिया उपयोगकर्ता डॉ. कपिल काकर के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​की कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया गया। काकर ने ऐसे "अपमानजनक" वीडियो पोस्ट किए थे, जिनमें पिछले दिनों साकेत इलाके में एक बहुमंजिला इमारत गिरने के लिए हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश को जिम्मेदार ठहराया था। इस घटना में छह लोगों की मौत हो गई थी। 

अदालत की अवमानना ​​की याचिका पर काकर को नोटिस जारी करते हुए न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा और न्यायमूर्ति मधु जैन की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि वीडियो में लगाए गए आरोप "बेहद अपमानजनक और अदालत की अवमानना ​​करने वाले" हैं और ये न्याय दिलाने की प्रक्रिया में सीधे दखल के बराबर हैं।

अकाउंट और हैंडल ब्लॉक करने का निर्देश

अदालत ने इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और 'एक्स' समेत विभिन्न सोशल मीडिया मंचों को आपत्तिजनक लिंक हटाने और काकर के अकाउंट व हैंडल ब्लॉक करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जैसे ही इन कंपनियों को अपने मंच पर किसी गैरकानूनी सामग्री की जानकारी मिलती है, उनका दायित्व बन जाता है कि वे उस सामग्री को तुरंत हटाएं और उस तक पहुंच को अवरुद्ध करें। आदेश की प्रति बुधवार को अदालत की वेबसाइट पर अपलोड की गई। 

अदालत ने आदेश में कहा, "समाज को नुकसान पहुंचाने, न्यायपालिका की आजादी में दखल देने और संस्थाओं व व्यक्तियों की छवि खराब करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की किसी भी कोशिश को इस देश में स्वीकार नहीं किया जा सकता, जहां कानून का शासन और संविधान के सिद्धांत लागू हैं।"

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